भारतीय पारिवारिक विधि में भरण-पोषण के प्रावधान आश्रित जीवनसाथी एवं बच्चों के सम्मानजनक जीवन यापन को सुनिश्चित करने हेतु बनाए गए हैं।
प्रमुख विधिक निष्कर्ष
धारा 144 BNSS / 125 Cr.P.C. एवं धारा 24 HMA के तहत भरण-पोषण दावों में सर्वोच्च न्यायालय के रजनीश बनाम नेहा दिशा-निर्देशों के अनुसार आय, संपत्ति एवं देनदारियों का शपथ पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
1. भरण-पोषण से संबंधित वैधानिक प्रावधान
धारा 144 BNSS त्वरित मासिक भरण-पोषण उपचार प्रदान करती है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 वाद व्यय एवं अंतरिम भरण-पोषण की व्यवस्था करती है।
2. संपत्ति एवं आय का अनिवार्य प्रकटीकरण
दोनों पक्षों को अपने बैंक खाते, अचल संपत्तियां, वाहन, आयकर रिटर्न एवं जीवन-यापन खर्च का मानकीकृत शपथ पत्र दाखिल करना होता है।
3. भरण-पोषण राशि (Quantum) का निर्धारण
न्यायालय दोनों पक्षों की आय क्षमता, वैवाहिक जीवन के दौरान रहे जीवन स्तर, पारिवारिक देनदारियों एवं बच्चों की शिक्षा के आधार पर राशि तय करता है।
4. आदेश का प्रवर्तन एवं बकाया वसूली
भरण-पोषण आदेशों की वसूली वेतन कुर्की, संपत्ति कुर्की अथवा जानबूझकर चूक करने पर कारावास के माध्यम से की जा सकती है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
विधिक मार्गदर्शन नोट | RCS & Associates (रुड़की व हरिद्वार में अनुभवी वकील एवं अधिवक्ता)
संस्थापक: रमेश चन्द सैनी (पूर्व वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी, उ.प्र. | M.A., MBA, LL.M.) | सदस्य: अमरदीप सैनी (नोटरी एवं अधिवक्ता)
यह विधिक आलेख सामान्य सूचना एवं शैक्षणिक संदर्भ हेतु प्रकाशित किया गया है। यदि आपको उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल), सर्वोच्च न्यायालय अथवा जिला एवं सत्र न्यायालय हरिद्वार (रोशनाबाद) / रुड़की में रिट याचिका, स्टे आर्डर (Stay Order), अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS / 438 Cr.P.C.), नियमित जमानत, चेक बाउंस अथवा दीवानी विवाद में विधिक परामर्श आवश्यक है, तो कृपया संपर्क करें।