दीवानी मुकदमों में अंतरिम व्यादेश (Injunction) विवादित संपत्ति की स्थिति को बनाए रखने और वादी के अधिकारों की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण उपचार है।
प्रमुख विधिक निष्कर्ष
आदेश 39 CPC के तहत व्यादेश प्राप्त करने हेतु 3 अनिवार्य शर्तें सिद्ध करनी होती हैं: प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन वादी के पक्ष में होना, तथा व्यादेश न मिलने पर अपूरणीय क्षति होना।
1. आदेश 39 नियम 1 एवं 2 का उद्देश्य
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान संपत्ति को नष्ट करने, बेचने, अवैध निर्माण करने अथवा वादी को बेदखल करने से रोकना।
2. व्यादेश के 3 स्वर्णिम सिद्धांत
न्यायालय पंजीकृत विलेखों, राजस्व अभिलेखों एवं वास्तविक भौतिक कब्जे के आधार पर प्रथम दृष्टया हक एवं सुविधा के संतुलन का परीक्षण करता है।
3. एकपक्षीय अंतरिम आदेश (Ex-Parte Injunction)
अत्यावश्यक मामलों में न्यायालय प्रतिवादी को नोटिस दिए बिना अंतरिम रोक लगा सकता है, जिसकी अनुपालना आदेश 39 नियम 3 के अनुसार अनिवार्य है।
4. व्यादेश आदेश के उल्लंघन के परिणाम
आदेश 39 नियम 2A के तहत व्यादेश का उल्लंघन करने पर संपत्ति कुर्की एवं 3 माह तक सिविल कारावास का प्रावधान है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
विधिक मार्गदर्शन नोट | RCS & Associates (रुड़की व हरिद्वार में अनुभवी वकील एवं अधिवक्ता)
संस्थापक: रमेश चन्द सैनी (पूर्व वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी, उ.प्र. | M.A., MBA, LL.M.) | सदस्य: अमरदीप सैनी (नोटरी एवं अधिवक्ता)
यह विधिक आलेख सामान्य सूचना एवं शैक्षणिक संदर्भ हेतु प्रकाशित किया गया है। यदि आपको उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल), सर्वोच्च न्यायालय अथवा जिला एवं सत्र न्यायालय हरिद्वार (रोशनाबाद) / रुड़की में रिट याचिका, स्टे आर्डर (Stay Order), अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS / 438 Cr.P.C.), नियमित जमानत, चेक बाउंस अथवा दीवानी विवाद में विधिक परामर्श आवश्यक है, तो कृपया संपर्क करें।