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उपभोक्ता संरक्षण

उपभोक्ता परिवाद: सेवा में कमी एवं कानूनी उपचार

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 उपभोक्ताओं को कंपनियों, बिल्डरों, बैंकों एवं सेवा प्रदाताओं के मनमानेपन के विरुद्ध सशक्त कानूनी अधिकार देता है।

प्रमुख विधिक निष्कर्ष

सेवा में कमी (Deficiency in Service) या दोषपूर्ण उत्पाद के मामले में उपभोक्ता विवाद उत्पन्न होने के 2 वर्ष के भीतर जिला उपभोक्ता आयोग में मुआवजा एवं धन वापसी का परिवाद दायर कर सकता है।

1. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के मुख्य प्रावधान

जिला आयोग (50 लाख तक), राज्य आयोग (2 करोड़ तक) एवं राष्ट्रीय आयोग का त्रिस्तरीय ढांचा।

2. सेवा में कमी के प्रमुख उदाहरण

बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज करना, बिल्डर द्वारा फ्लैट का कब्जा न देना, बैंक द्वारा गलत कटौती, एवं एयरलाइंस/होटल की लापरवाही।

3. परिवाद दायर करने की प्रक्रिया

ई-दाखिल (e-Daakhil) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन या आयोग के समक्ष सीधे परिवाद प्रस्तुत करना।

4. अनुतोष एवं मुआवजा (Relief & Damages)

उत्पाद की कीमत वापसी, मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा, ब्याज एवं विधिक व्यय की वसूली।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

सामान्यतः व्यावसायिक उद्देश्य हेतु खरीदे गए उत्पादों पर यह अधिनियम लागू नहीं होता, जब तक कि वह आजीविका कमाने हेतु व्यक्तिगत रूप से न उपयोग किया गया हो।

धारा 72 CPA के तहत आदेश का उल्लंघन करने पर 3 वर्ष तक का कारावास एवं 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
Ramesh Chand Saini, Advocate
विधिक मार्गदर्शन नोट | RCS & Associates (रुड़की व हरिद्वार में अनुभवी वकील एवं अधिवक्ता)

संस्थापक: रमेश चन्द सैनी (पूर्व वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी, उ.प्र. | M.A., MBA, LL.M.) | सदस्य: अमरदीप सैनी (नोटरी एवं अधिवक्ता)

यह विधिक आलेख सामान्य सूचना एवं शैक्षणिक संदर्भ हेतु प्रकाशित किया गया है। यदि आपको उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल), सर्वोच्च न्यायालय अथवा जिला एवं सत्र न्यायालय हरिद्वार (रोशनाबाद) / रुड़की में रिट याचिका, स्टे आर्डर (Stay Order), अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS / 438 Cr.P.C.), नियमित जमानत, चेक बाउंस अथवा दीवानी विवाद में विधिक परामर्श आवश्यक है, तो कृपया संपर्क करें।

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