भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के प्रवर्तन एवं किसी अन्य उद्देश्य हेतु निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की असाधारण विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है।
प्रमुख विधिक निष्कर्ष
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिका की पोषणीयता हेतु मूल अधिकारों का हनन, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, राज्य का मनमानापन अथवा वैधानिक अपीलीय उपचारों की अनुपलब्धता या अप्रभावशीलता सिद्ध करना आवश्यक है।
1. अनुच्छेद 226 बनाम सामान्य दीवानी उपचार
सामान्य दीवानी मुकदमों के विपरीत, उच्च न्यायालय पूर्ण संवैधानिक क्षेत्राधिकार रखता है। यह उपचार असाधारण है और जब तक विशेष परिस्थितियां न हों, सामान्य सांविधिक अपील के विकल्प के रूप में इसका उपयोग नहीं किया जा सकता।
2. प्रमुख विशेषाधिकार रिट (Prerogative Writs)
परमादेश (Mandamus) सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन हेतु, उत्प्रेषण (Certiorari) अवैध आदेशों को निरस्त करने हेतु, तथा प्रतिषेध (Prohibition) अधीनस्थ अधिकरणों को क्षेत्राधिकार से बाहर जाने से रोकने हेतु जारी होती है।
3. वैकल्पिक उपचार का सिद्धांत (Doctrine of Alternative Remedy)
यद्यपि वैकल्पिक विधिक उपचार की उपस्थिति पूर्ण रोक नहीं है, उच्च न्यायालय सामान्यतः सांविधिक उपायों को पहले समाप्त करने की अपेक्षा करता है, सिवाय जब पूर्ण क्षेत्राधिकार की कमी या प्राकृतिक न्याय का हनन हो।
4. उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल) में विधिक प्रक्रिया
हरिद्वार, रुड़की, देहरादून एवं अन्य जनपदों से उत्पन्न रिट याचिकाएं नैनीताल स्थित रजिस्ट्री में दाखिल होती हैं। अत्यावश्यक याचिकाओं में तुरंत अंतरिम स्थगन (Stay) की मांग की जा सकती है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
विधिक मार्गदर्शन नोट | RCS & Associates (रुड़की व हरिद्वार में अनुभवी वकील एवं अधिवक्ता)
संस्थापक: रमेश चन्द सैनी (पूर्व वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी, उ.प्र. | M.A., MBA, LL.M.) | सदस्य: अमरदीप सैनी (नोटरी एवं अधिवक्ता)
यह विधिक आलेख सामान्य सूचना एवं शैक्षणिक संदर्भ हेतु प्रकाशित किया गया है। यदि आपको उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल), सर्वोच्च न्यायालय अथवा जिला एवं सत्र न्यायालय हरिद्वार (रोशनाबाद) / रुड़की में रिट याचिका, स्टे आर्डर (Stay Order), अग्रिम जमानत (धारा 482 BNSS / 438 Cr.P.C.), नियमित जमानत, चेक बाउंस अथवा दीवानी विवाद में विधिक परामर्श आवश्यक है, तो कृपया संपर्क करें।